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बहुत दिन हुए मुझे गांव गए,
हाँ बहुत दिन हुए मुझे गावो गए।
पता नहीं मेरे गावों का रास्ता अब मुझे याद करता भी होगा या नहीं,
सुना है वो कच्ची पगडंडियां अब पक्की सड़क बन गयी,
मेरे गावों को जाने वाली अब बस बहुत हो गयीं,
फिर भी बहुत दिन हो गए मुझे गावों गए हुए,
हाँ बहुत दिन हुए गावों गए हुए.
मेरे गावों के घर के बगल में एक छोटी नदी बहती है,
सुना है अब उसके किनारो पे पत्थर लग चुके हैं,
बरसों पहले जब भी गावों जाता था , उस छोटी सी नदी में मैं घंटो नहाता था,
अब तो सालों गुज़र गए उस नदी में नहाये हुए,
हाँ बहुत दिन हुए मुझे गावों गए हुए,
गावों के वो खेत बहुत याद आते हैं,
हरे भरे भीनी सी खुश्बू लिए,
गन्नो के खेत में बड़े भैया संग, ताज़ी गन्नों को तोड़ कर खाना,
घर से खेत तक, बुग्गी को बहुत तेज़ भगाना,
और फिर थके हुए अपने भैंसे को खूब पानी पिलाना और नहाना,
बहुत दिन हो गए ये सब किये हुए,
हाँ बहुत दिन हुए, मुझे मेरे गावों गए हुए,
गावों में आम के भी बाग़ हैं हमारे,
गर्मियों में सब जाते थे बाग़ में पेड़ों से तोड़ तोड़ आम खाने,
वो आम के रस में हाथ मुह सब सन जाते थे,
पर क्या कहूँ, उन पेड़ों पर फल ही इतने मीठे आते थे,
एक जमाना हुआ, उन पेड़ो की डालियों पर झूले हुए,
हाँ बहुत दिन हुए मुझे गाओं गए हुए.
जब रात होती थी तो मेरी ताई हम सब को कहानी सुनती थी,
पता भी ना चलता था, कब उस कहानी को सुनते सुनते नींद आ जाती थी,
गर्मियों में रातों में अक्सर तारों को भी खूब गिना करते थे,
मेरे गावों के आसमान में तारे बहुत दीखते थे,
बड़े दिन हुए, खुले आसमान के नीचे चारपाई पे सोये हुए,
हाँ बहुत दिन हुए मुझे गावों गए हुए।
मेरे बचपन की ये यादें कुछ इस तरह मन पर आज डेरा डाले हुए हैं,
मन पूछता है क्यों इतने दिन हुए गावों गए हुए, क्यों इतने दिन हुए गावों गए हुए।

यशपाल सिंह
२५/०६/२०१५