सपना तो मेरा है
सपना तो मेरा है, किसी और को उसके होने ना होने से फर्क क्या है,
मेरे अहसासों, मेरे विचारों, या तर्क का, किसी और के लिए मतलब ही क्या है,
पहले भी टूटे हैं मेरे सपने, पहली भी मेरी कई उम्मीदों ने दम तोडा है,
पर मेरे सिवा उन पर कोई क्या रोया है,
सपना तो मेरा है, किसी और को उसके होने न होने से फर्क क्या है,
जुगनू की तरह टिम टिमाते उस सपने को पकड़ने की कोशिश मेरी,
हर बार नाकामयाब होती है, कभी वो पल में गुम होता है,
या फिर कभी वो हमेशा के लिए दूर चला जाता है,
मैं निकलता हूँ खोज में उसकी, उसके सिवा यहाँ मेरा क्या है,
मैं थक हार कर हर बार की तरह घर आ जाता हूँ,
इस घर के सिवा मेरा और कोई ठिकाना क्या है,
सपना तो मेरा है, किसी और को उसके होने न होने से फर्क क्या है,
कभी रातों को अकेले में, भरी हुई आँखों से उसे खोते देखा,
कभी दिन के उजाले में, उसे अपने सामने टूट जाते देखा,
मैंने जोड़ जोड़ के टुकड़े, उसे बनाया है फिर से कई बार,
मगर हर बार जोड़ते हुए मैंने, अपने कटे हुए हाथों को भी देखा है,
जब नज़र उठाता हूँ जोड़ कर सपने को, मैं अक्सर खुद को अकेला पाता हूँ,
फिर समझ आता है, सपना तो मेरा है, किसी और को उसके होने न होने से फर्क क्या है,
मैं लिखता हूँ ये कविता सी दिखने वाली चीज़, अपना दर्द दिखाने को,
बताता हूँ खुद को, की हो गए अब बहुत साल, चल छोड़ अब सब कुछ मेरे यार,
जब बंद करने को होता हूँ, तो मन कहता हैं, ये आखिरी सपना था मेरा,
अब और टुकड़ों से इसे जोड़ कर नहीं बनाऊंगा, आखिर इन कटे हाथों से जीवन की गाडी कैसे चला पाऊंगा,
बीच रास्ते में, उस आखिरी सपने से , उस मेरे बच्चे से, मेरा मासूम सा प्यार फिर से उमड़ आता है,
भरी हुई आँखों से उसे फिर से सच करने का जी चाहता है,
सोचता हूँ चल रही हैं सांस, वो अभी रुक तो नहीं रही,
जब रुकेंगी तो अपने आप सब सपने शांत होकर दूर चले जायेंगे,
पर जितने चल रही हैं ये सांस, फिर एक बार कोशिश कर ले यार,
आखिर सपना तो मेरा है…किसी और को हो ना हो, पर मेरे दिल पर तो इसका फर्क पड़ता हैं ना यार..
यशपाल सिंह
०७-०४-२०२१
१२:४०