भगवद गीता सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व का एक महत्वपूर्ण हिन्दू ग्रंथ है जो महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत है। यह गीता 700 श्लोकों की एक महत्वपूर्ण वाणी है जिसमें अर्जुन और श्रीकृष्ण के बीच हुई वार्ता का वर्णन किया गया है। गीता का मुख्य संदेश योग, धर्म, और आत्मा के विकास के माध्यम से आत्मा के मोक्ष की ओर जाने का है।
गीता में अर्जुन के विचारवाद से जुड़ी चिंताओं और संदेशों को उनके जीवन के संघर्षों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को धर्म, कर्म, भक्ति, और ज्ञान के माध्यम से आत्मा के मोक्ष की ओर जाने के लिए मार्गदर्शन दिया।
गीता में कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक और आदर्श भी दिए गए हैं जैसे कि कर्म योग, भक्ति योग, और ज्ञान योग के माध्यम से आत्मा का विकास करने का संदेश। गीता में आत्मा के अनिवार्य अस्तित्व की महत्वपूर्ण जानकारी भी है, और यह बताया जाता है कि आत्मा अमर और अविनाशी है।
गीता का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को अपने कर्मों को सही तरीके से करना चाहिए, निष्काम कर्म की प्रकृति को समझना चाहिए, और भगवान के प्रति निःस्वार्थ भाव रखना चाहिए। इसके आलावा, गीता मन को शांत करने, आत्मा के विकास करने, और आत्मा के अंदर दिव्यता को पहचानने के माध्यम से आत्मा के मोक्ष की ओर जाने की जरूरत को बताती है।
भगवद गीता का महत्व यह है कि यह हमें धर्म, कर्म, भक्ति, और ज्ञान के माध्यम से आत्मा के मोक्ष की ओर जाने का मार्ग प्रदान करती है, और हमें अपने जीवन को सही और धार्मिक दिशा में जीने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है। यह एक धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रंथ है जिसका महत्व आज भी अद्वितीय है और जीवन के सभी पहलुओं में उपयोगी है।
गीता का एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें सभी हिन्दू ग्रंथों के महत्वपूर्ण सिद्धांत और तत्त्वों का संक्षेप में समाहित है। गीता के श्लोकों में कर्म का महत्व, धर्म का पालन, भक्ति की महत्वपूर्णता, और ज्ञान के माध्यम से आत्मा की खोज के सिद्धांत हैं। इसके आलावा, गीता में आत्मा के अनिवार्य अस्तित्व की महत्वपूर्ण जानकारी भी है, और यह बताया जाता है कि आत्मा अमर और अविनाशी है।
गीता के शिक्षाएँ सभी हिन्दू ग्रंथों के मौलिक सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत करती हैं और इसे एक ही स्थान पर उपलब्ध कराती हैं। यह ग्रंथ हमें सही और धार्मिक जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है और हमें अपने जीवन को सही और सत्य मार्ग पर ले जाने में मदद करता है। गीता का महत्व यह है कि यह हमें सभी हिन्दू धर्म के ग्रंथों के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत करती है और हमें एक आदर्श जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है। यह एक धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रंथ है जिसका महत्व आज भी अद्वितीय है और जीवन के सभी पहलुओं में उपयोगी है।
भगवद गीता का एक महत्वपूर्ण प्राथमिक विषय है योग का अभ्यास। भगवद गीता के संदर्भ में योग न केवल शारीरिक व्यायाम है, बल्कि यह आत्मा की आध्यात्मिक साक्षरता और आत्म-खोज का एक व्यापक मार्ग है।
भगवद गीता में विभिन्न प्रकार के योग के मार्गों का वर्णन किया गया है, जिनमें हर एक का अपना विशेष दृष्टिकोण और उद्देश्य होता है। इन मार्गों का उद्देश्य आत्मा की स्वानुभूति और आत्म-साक्षरता है। गीता में मुख्य योग मार्गों का वर्णन निम्नलिखित है:
कर्म योग: कर्म योग अनासक्त क्रिया का योग है। इसमें यह सिखाया जाता है कि कर्मों को भगवान को अर्पित करके बिना फलों के बारे में चिंता किए, किया जाना चाहिए। यह मार्ग भगवान के प्रति विनम्र भाव से कार्य करने और मन को शुद्ध करने के महत्व को बताता है।
कर्म योग: भगवद गीता का संदेश
कर्म योग का मुख्य संदेश है कि हमें अपने कर्मों को निष्काम भाव से करना चाहिए। इसका मतलब है कि हमें कर्मों की फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि हमें सिर्फ कर्म करने में लगना चाहिए। कर्म योग के अनुसार, हमें अपने कर्मों को ईश्वर के लिए समर्पित करना चाहिए और फल का आत्म से अलग मानना चाहिए।
गीता में कहा गया है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥” इसका अर्थ है कि हमें केवल कर्म करने का अधिकार है, फलों का नहीं। हमें कर्मों के फल की चिंता नहीं करनी चाहिए और हमारे कर्म हमारी आत्मा के विकास के लिए होने चाहिए।
कर्म योग के माध्यम से हम अपने कर्मों को ईश्वर के साथ जोड़कर आत्मा के मोक्ष की ओर बढ़ सकते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि हमारे कर्म हमारे आत्मा के विकास के लिए एक माध्यम हैं और हमें इन्हें ईश्वर की सेवा के रूप में करना चाहिए।
कर्म योग का संदेश यह है कि हमें कर्मों को निष्काम भाव से करने का प्रयास करना चाहिए और हमें फल का आत्म से अलग मानना चाहिए। इसके माध्यम से हम आत्मा के मोक्ष की ओर बढ़ सकते हैं और एक धार्मिक और सफल जीवन जी सकते हैं। कर्म योग का महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें कर्मों की चिंता छोड़नी चाहिए और हमें सिर्फ कर्म करने का आनंद लेना चाहिए।
भक्ति योग: भक्ति योग भगवान के प्रति भक्ति और प्यार का मार्ग है। इसमें भगवान के प्रति निरंतर भक्ति और उसके दिव्य इच्छा में समर्पण का सुझाव दिया जाता है। गीता में यह बताया गया है कि सच्ची भक्ति और आत्मा के गहरे संबंध को पैदा करती है और आखिरकार मुक्ति को प्राप्त करने में मदद करती है।
भक्ति योग: भगवद गीता का संदेश
भक्ति योग का मुख्य संदेश है कि हमें भगवान के प्रति पूर्ण भक्ति और समर्पण रखना चाहिए। इसका मतलब है कि हमें भगवान के साथ एक दिव्य संबंध बनाना चाहिए और हमें अपने कार्यों और जीवन को भगवान की सेवा में समर्पित करना चाहिए।
गीता में कहा गया है, “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥” इसका अर्थ है कि जैसे लोग मुझको प्राप्त होते हैं, मैं उनके प्रति वैसे ही भक्ति करता हूँ, और मनुष्य भगवान के विभिन्न रूपों में पूर्ण भक्ति रखते हैं, वैसे ही भगवान उनके प्रति समर्पित रहते हैं।
भक्ति योग के माध्यम से हम अपने आत्मा को भगवान के साथ मिलाकर आत्मा के मोक्ष की ओर बढ़ सकते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि भगवान के साथ हमारा संबंध एक प्रेम और समर्पण का होना चाहिए और हमें अपने कार्यों को भगवान के लिए करना चाहिए।
भक्ति योग का संदेश यह है कि हमें भगवान के प्रति पूर्ण विश्वास और प्रेम रखना चाहिए और हमें अपने कार्यों को भगवान की सेवा के रूप में करना चाहिए। इसके माध्यम से हम आत्मा के मोक्ष की ओर बढ़ सकते हैं और एक धार्मिक और सफल जीवन जी सकते हैं। भक्ति योग का महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और विश्वास रखना चाहिए और हमें अपने कार्यों को भगवान की सेवा में समर्पित करना चाहिए।
ज्ञान योग: ज्ञान योग ज्ञान और विवेक का मार्ग है। इसमें आत्मा की स्वभाविक स्वरूप की जांच और विचार करने की प्रक्रिया है। गीता में ज्ञान योग का उद्देश्य आत्मा की सच्ची स्वरूप को समझना और व्यक्ति की आत्मा (आत्मन) को सर्वव्यापी चेतना (ब्रह्मन) के साथ एकता की पहचान करना है।
ज्ञान योग: भगवद गीता का संदेश
गीता में ज्ञान योग का मुख्य संदेश है कि हमें आत्मा के असली स्वरूप को समझना चाहिए और हमें आत्मा की अनन्य भक्ति करनी चाहिए। इसका मतलब है कि हमें आत्मा के स्वरूप को जानने का प्रयास करना चाहिए और हमें आत्मा के सच्चे स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए।
गीता में कहा गया है, “आत्मा यथात्मनि तिष्ठति।” इसका अर्थ है कि हमें अपने आत्मा के सच्चे स्वरूप में स्थित रहना चाहिए और हमें अपने आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए।
ज्ञान योग के माध्यम से हम आत्मा के सच्चे स्वरूप को जान सकते हैं और हमें आत्मा के मोक्ष की ओर ले जाने का मार्ग प्रदान किया जाता है। हमें यह समझना चाहिए कि आत्मा हमारे शरीर और मन से अलग है और यह अनन्य भक्ति के माध्यम से ही प्राप्त हो सकता है।
ज्ञान योग का संदेश है कि हमें आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने का प्रयास करना चाहिए और हमें आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए। इसके माध्यम से हम आत्मा के मोक्ष की ओर बढ़ सकते हैं और आत्मा के सच्चे स्वरूप को जान सकते हैं। ज्ञान योग का महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए और हमें आत्मा के सच्चे स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए।
ध्यान योग: ध्यान योग ध्यान और सजगता का योग है। इसमें मन को शांत करने और आंतरिक शांति प्राप्त करने के लिए ध्यान और मनन का अभ्यास किया जाता है।
ध्यान योग: भगवद गीता का संदेश
गीता में ध्यान योग का मुख्य संदेश है कि हमें आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने का प्रयास करना चाहिए और हमें मानसिक शांति की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। ध्यान योग के माध्यम से हम अपने मन को शांत करके और आत्मा के साथ जुड़कर आत्मा के सच्चे स्वरूप को जान सकते हैं।
ध्यान योग के माध्यम से हम मन को शांत करने का प्रयास करते हैं। हम ध्यान के माध्यम से अपने मन को एक ही स्थिति में स्थित रखने का प्रयास करते हैं और हमें आत्मा के साथ जुड़कर आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने का मौका मिलता है।
ध्यान योग के माध्यम से हम दिव्यता की ओर बढ़ते हैं। हम ध्यान के माध्यम से दिव्य जीवन का अनुभव करते हैं और हमें आत्मा के साथ जुड़कर आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने का मौका मिलता है।
ध्यान योग का महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें मानसिक शांति, आत्मा के मोक्ष, और दिव्यता की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। ध्यान योग हमें अपने मन को शांत करने का प्रयास करने का मौका देता है और हमें आत्मा के साथ जुड़कर आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने का मौका देता है। ध्यान योग का महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें मानसिक शांति, आत्मा के मोक्ष, और दिव्यता की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
भगवद गीता के अनुसार योग की परिभाषा
भगवद गीता के अनुसार योग की परिभाषा है: “योगः कर्मसु कौशलम्।” इसका अर्थ है कि योग वह उपाय है जिसके माध्यम से हम कर्मों में कौशल (यानी माहिरी) प्राप्त करते हैं। योग के माध्यम से हम अपने कर्मों को एक ऐसे तरीके से करते हैं जो हमारे आत्मा के साथ समर्पित होते हैं और हमारे आत्मा के मोक्ष की ओर ले जाते हैं। इसके माध्यम से हम कर्मों को एक साधना बनाते हैं जो हमें आत्मा के साथ जोड़ती है और हमें आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने का मौका देती है।
भगवद गीता के अनुसार मन को नियंत्रित करना और मन-प्रबंधन मानव कल्याण के लिए महत्व
भगवद गीता के अनुसार मन को नियंत्रित करना और मन-प्रबंधन मानव कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है। मन को नियंत्रित करने का महत्व निम्नलिखित कारणों से है:
1. मन का उद्धारण: मन विचारों, भावनाओं, और इच्छाओं का मूख्य स्रोत होता है। अगर मन अनियंत्रित हो तो यह हमें भ्रमित कर सकता है और हमें गलत निर्णयों पर पहुँचा सकता है। मन को नियंत्रित करके हम सही और उचित निर्णय ले सकते हैं।
2. आत्म-समर्पण: भगवद गीता में मन को आत्मा के साथ एकात्मता में प्रस्तुत किया गया है। योग के माध्यम से हम अपने मन को आत्मा के साथ समर्पित कर सकते हैं, जिससे हमारा जीवन संतुलित और सुखमय होता है।
3. ध्यान और आत्म-जागरूकता: मन को नियंत्रित करने के माध्यम से हम ध्यान और आत्म-जागरूकता विकसित कर सकते हैं। ध्यान और आत्म-जागरूकता के माध्यम से हम अपने आप को और अपने चारों ओर के परिस्थितियों को गहरी तरीके से समझ सकते हैं।
4. कर्मों का सुधारण: योग के माध्यम से हम अपने कर्मों को भी सुधार सकते हैं। मन को नियंत्रित करके हम अपने कर्मों को अच्छी तरह से करते हैं और अधिकतर पापकर्मों से बच सकते हैं।
5. आंतरिक शांति: मन को नियंत्रित करने के माध्यम से हम आंतरिक शांति और सुकून की स्थिति प्राप्त कर सकते हैं। योग के द्वारा हम मन को शांत करते हैं, मानसिक बकवास को कम करते हैं, और गहरी शांति की स्थिति प्राप्त करते हैं।
6. स्वास्थ्य: मन को नियंत्रित करने के माध्यम से हम अपने शारीरिक स्वास्थ्य को भी सुधार सकते हैं। मन के शांत रहने से स्वास्थ्य के अनेक पहलु सुधरते हैं, जैसे कि ब्लड प्रेशर कम होता है और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
इसलिए, भगवद गीता के अनुसार मन को नियंत्रित करना हमारे जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानव कल्याण के लिए मानसिक शांति और आत्म-साक्षरता की प्राप्ति के लिए मन को नियंत्रित करने का योगदान हमारे जीवन को सुखमय और सान्त्वना पूर्ण बना सकता है।
भगवद गीता के अनुसार, यदि आपके विचार असमयिक और अनियंत्रित रहते हैं, तो इसके कुछ महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकते हैं:
1. अध्यात्मिक आत्म-हानि: गीता में कहा गया है कि असमयिक और अनियंत्रित विचारों के कारण आत्मा की हानि हो सकती है। योगी को अपने विचारों को नियंत्रित करना सिखना चाहिए ताकि वह आत्मा के सच्चे स्वरूप को समझ सके और आत्मा के साथ एकात्मता प्राप्त कर सके।
2. कर्मों में अव्यवस्था: यदि आपके विचार असमयिक और अनियंत्रित होते हैं, तो आपके कर्मों में अव्यवस्था हो सकती है। कर्मों में अव्यवस्था आपके जीवन को असफल बना सकती है और समस्याएँ उत्पन्न कर सकती हैं।
3. आंतरिक आत्मा की अशांति: योग के माध्यम से मन को नियंत्रित करने का मुख्य उद्देश्य आंतरिक शांति की प्राप्ति है। असमयिक और अनियंत्रित विचारों के कारण मानसिक अशांति हो सकती है, जिससे आत्मा की शांति में बाधा हो सकती है।
4. निर्णय में कठिनाइयाँ: यदि आपके विचार अनियंत्रित होते हैं, तो आप निर्णय लेने में कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं। योग के माध्यम से मन को नियंत्रित करने से हम सही और उचित निर्णय ले सकते हैं।
5. कार्यों में असफलता: यदि मन अनियंत्रित होता है, तो कार्यों में असफलता हो सकती है क्योंकि मन के असमयिक विचार कार्यों को प्रभावित कर सकते हैं और उन्हें नकारात्मक दिशा में ले जा सकते हैं।
6. आत्मा के साथ असमर्पण: गीता में आत्मा के साथ एकात्मता का महत्वपूर्ण भाग बताया गया है। यदि मन असमयिक और अनियंत्रित होता है, तो आत्मा के साथ एकात्मता प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है और आत्मा के साथ समर्पण की बजाय असमर्पण हो सकता है।
इसलिए, भगवद गीता के अनुसार, असमयिक और अनियंत्रित विचारों के कारण मन को नियंत्रित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है ताकि आत्मा के साथ एकात्मता प्राप्त की जा सके और मानसिक शांति और साक्षरता की प्राप्ति हो सके।
दुःखों का समापन योग कहलाता है
योग भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण और गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक अध्ययन का हिस्सा है। यह न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारने का एक माध्यम है, बल्कि मानसिक और आत्मिक शांति की प्राप्ति में भी मदद करता है। योग का मूल उद्देश्य दुःखों का समापन है, और इसके माध्यम से हम अपने जीवन को एक सुखमय और सांत्वना भरा बना सकते हैं।
भगवद गीता के अनुसार, योग का मुख्य उद्देश्य दुःखों का समापन है। गीता में कहा गया है कि योगी विचारों को नियंत्रित करने के माध्यम से अपने दुःखों का समापन करता है और आत्मा के सच्चे स्वरूप को समझता है। योग के माध्यम से हम अपने विचारों को शांत करते हैं, मानसिक बकवास को कम करते हैं, और गहरी शांति की स्थिति प्राप्त करते हैं।
योग के माध्यम से हम अपने मानसिक स्वास्थ्य को सुधार सकते हैं और अपने दुःखों का समापन कर सकते हैं। यह हमें सकारात्मक सोचने की क्षमता प्रदान करता है और हमारे जीवन को एक खुशहाली और सुखमय दिशा में मदद करता है। योगी अपने अंतरात्मा के साथ एकात्मता प्राप्त करता है और उसे दुःखों से मुक्ति प्राप्त होती है।
योग का अर्थ है किसी की आत्मा के साथ एकता की प्राप्ति, जिसके माध्यम से हम अपने दुःखों का समापन कर सकते हैं। योग के माध्यम से हम अपने जीवन को एक सांत्वना और सुखमय दिशा में मोड़ सकते हैं और हमें दुःखों के साथ बिना ही जीवन का आनंद प्राप्त हो सकता है। योग हमें अपने दुःखों का समापन करने का मार्ग दिखाता है और हमें जीवन के हर पहलू में सुखमय और आत्मिक स्थिति प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करता है। इसलिए, योग का महत्व यह है कि यह हमें दुःखों से मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है और हमें एक सुखमय और प्रसन्न जीवन की दिशा में मदद करता है।
भगवान कृष्ण ज्ञानी पुरुष का वर्णन करते हुए
भगवद गीता में, भगवान कृष्ण एक “ज्ञानी पुरुष” या “बुद्धिमान व्यक्ति” के रूप में वर्णित करते हैं, जिसमें कुछ विशेष गुण और लक्षण होते हैं। एक ज्ञानी पुरुष वह व्यक्ति होता है जिसने आध्यात्मिक ज्ञान और समझ प्राप्त किया है। यहां भगवद गीता में ज्ञानी पुरुष के कुछ गुण और लक्षणों का वर्णन है:
1. आत्मा-साक्षात्कार: एक ज्ञानी पुरुष को अपने आत्मा (आत्मन) का गहरा समझ होता है और वे आत्मा की शाश्वत प्रकृति की पहचान करते हैं। वे शारीरिक शरीर और असली आत्मा के बीच का भिन्नता समझते हैं।
2. समता: एक ज्ञानी पुरुष आनंद और दुख, सफलता और असफलता, बड़े और छोटे सभी में समान रूप से रहता है। वे बाह्य परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते और आंतरिक शांति बनाए रखते हैं।
3. अलगाव: ऐसे व्यक्तियां सामग्री संपत्ति और दुनियावी आसक्तियों से अलग होते हैं। वे अपने कर्तव्यों को बिना उनके कर्मों के फलों के साथ आसक्ति के बिना करते हैं।
4. विनम्रता: एक ज्ञानी पुरुष विनम्र होता है और अहंकार से विरक्त होता है। वे अपने क्रियाओं के लिए प्रशंसा या प्रशंसा नहीं चाहते हैं।
5. करुणा: सभी जीवों के प्रति करुणा और सहानुभूति एक ज्ञानी पुरुष की विशेषता है। वे सभी जीवों में दिव्यता को देखते हैं।
6. ज्ञान: इन व्यक्तियों के पास गहरा आध्यात्मिक ज्ञान होता है और वे दूसरों को धार्मिकता और आत्मा-साक्षात्कार के मार्ग पर मार्गदर्शन कर सकते हैं।
साधू कौन होता है?
भगवद गीता में, भगवान कृष्ण एक ऐसे व्यक्ति के गुणों का वर्णन करते हैं जिन्हें एक महर्षि या संत के समान विशेषता मिलती है। ऐसे व्यक्तियों को अक्सर “स्थित-प्रज्ञ” या स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति कहा जाता है। यहां भगवद गीता में एक महर्षि-समान व्यक्ति की पहचान के महत्वपूर्ण लक्षण हैं:
1. समता: महर्षि-समान व्यक्ति हर परिस्थिति में शांत और संयमित रहते हैं, चाहे वह आनंद या दुख, सफलता या असफलता हो। वे बाह्य परिस्थितियों से भावनात्मक रूप से प्रभावित नहीं होते।
2. अलगाव: ऐसे व्यक्तियां सामग्री संपत्ति और लोकिक इच्छाओं से अलग होते हैं। वे अपने कर्तव्यों को करते हैं बिना अपने कार्रवाई के परिणामों और प्राप्तियों के साथ आसक्ति के साथ।
3. आत्मनिग्रह: ऐसे व्यक्तियों के पास आत्मनिग्रह और स्वाध्याय है। उनके पास इंद्रियों पर विजय होती है और वे लालच या इच्छाओं में नहीं डूबते हैं।
4. ज्ञान: महर्षि-समान व्यक्ति के पास गहरा आध्यात्मिक ज्ञान और ज्ञान होता है। वे आत्मा (आत्मन) की शाश्वत प्रकृति को समझते हैं और सभी जीवों में दिव्यता की पहचान करते हैं।
5. करुणा: दया और सहानुभूति एक महर्षि की पहचान होती है। वे सभी जीवों के प्रति दयालु होते हैं और सभी में दिव्यता देखते हैं।
6. विनम्रता: महर्षि विनम्र होते हैं और अहंकार से मुक्त होते हैं। वे अपने कार्रवाइयों और प्राप्तियों के लिए प्रशंसा या प्रशंसा नहीं मांगते हैं।
7. अहिंसा: वे विचार, वाणी और कार्रवाइयों में अहिंसा का पालन करते हैं। वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं और दुनिया में शांति और सद्गति लाने का प्रयास करते हैं।
8. सत्य: महर्षि हमेशा सत्य बोलते हैं और मॉरल और नैतिक मूल्यों का पालन करते हैं। वे अपनी बातों में ईमानदार और सीधे रहते हैं।
9. संतोष: वे सरलता में संतोष ढूंढते हैं और वस्त्रीय विलासों की इच्छा नहीं करते। वे उनके पास जो है, उसमें संतोषपूर्ण होते हैं।
10. परमात्मा के प्रति समर्पण: महर्षि परमात्मा या ईश्वर के प्रति अनवरत समर्पण रखते हैं। वे जीवन के सभी पहलुओं में दिव्यता की मौजूदगी को मानते हैं और परमात्मा की इच्छा को स्वीकार करते हैं।
11. दूसरों के सेवा: महर्षियाँ दूसरों के भलाई और समाज के महत्वपूर्ण कार्यों में निष्काम सेवा (सेवा) करती हैं। वे मानवता के हित के लिए योगदान करती हैं।
12. आत्म-साक्षात्कार: उनकी अपनी आत्मा की गहरी समझ है और शारीरिक दुनिया की भ्रांतियों को पार कर चुके हैं।
महर्षि-समान गुणों के व्यक्ति की पहचान करने में इन लक्षणों का ध्यान देना शामिल है, और उनके कार्रवाइयों को दैनिक जीवन में देखना है। ऐसे व्यक्तियां धार्मिकता और आत्मा-साक्षात्कार के मार्ग पर राजा और आत्मा-साक्षात्कार के मार्ग पर अन्यों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शक और आदर्श के रूप में काम करते हैं।