ना जाने क्यों हम कुछ लिखते वक़्त उसको पढ़ने वालों के बारे में सोचते हैं,
जब भी कुछ करना चाहते हैं तो उस काम को देखने वालों के बारे में सोचते हैं,
कुछ बुरा करो तो ये सोचना जायज़ भी है,
हम लोग तो अच्छे काम को करते भी दस बार सोचते हैं,
बड़ा अजीब लगता है, जब सोचता हूँ बचपन के बारे में,
घर सर पर उठा लेते थे छोटी सी बात मनवाने में,
लड़ जाते थे सबसे, अपने यारों को बचाने के लिए,
कितने जिद्दी हुआ करते थे हम, अब तो हर जिद्द करते भी दस बार सोचते हैं |
याद है मुझे आज भी, ख़ुशी के मौकों पर हर किसी को बुला लेते थे, सब से दिल खोल कर बात होती थी, एक दुसरे के हर सुख दुःख की खोज खबर रहती थी, न जाने कौन सा जमाना आ गया है अब, अब तो दोस्तों को बुलाने में भी दस बार सोचते हैं,
कुछ पाने खोने का सुख-दुःख बचपन में सबसे ज्यादा महसूस होता था, कुछ मिल जाता था, तो खुल कर हस्ते थे, कुछ खो जाता था तो खुल कर रोते,
अब तो हँसते, रोते भी दस बार सोचते हैं,
बड़े होकर बड़े अजीब हो जाते हैं हम, खुल कर हंसना पागलपन लगता है और खुल के रोना कमज़ोरी,
जिद करना बचपना लगता है और हालातों से समझौता करना समझदारी,
अच्छे से बुरे, मज़बूत से लाचार बनते जाते हैं हम,
और बन रहे समझदार, बस ये सोचते हैं,
बीस-बीस साल के प्लान लेते हैं हम, भविष्य में खुश रहने के लिए,
और जिस काम को कर के आज ख़ुशी मिलती है,
उसे करते में हम, दस बार सोचते हैं,
शिकायत कोई नहीं किसी से मुझको,
बस ये ही है, की पता है हम सबको है,
किस बात से ख़ुशी मिलती है हमे,
हाँ उसे करने के बारे में थोड़ा देर से सोचते हैं.
यशपाल सिंह
२२/०६/२०१५