जब मैं अच्छा था तो अक्सर रोता रहता था,
जब बुरा बना तो अक्सर हंसा,
जब मैं अच्छा था तो लोग अक्सर मजाक बनाते थे,
जब बुरा बना तो मुझे गम्भीर हो लिया,
जब अच्छा था तो बहुत लोगों से दुश्मनी हो गयी,
जब बुरा बना तो दुश्मन भी दोस्त बन गए,
समझ में नहीं आता,
मैं “अच्छा” बुरा था, या “बुरा” अच्छा.
ये ऐसी एक पहेली है जिसे मैं आज तक सुलझा नहीं पाया,
अच्छा बनकर कभी किसी को समझा नहीं पाया,
जब अच्छा था तो लोगों को मेरे दिल में मैल नजर आया,
और जब मैं बुरा बना तो मैं साफ़ दिल इंसान नजर आया,
जब अच्छा बन लोगों के बारे में सोचा तो उन्हें उसमे मेरा स्वार्थ नजर आया,
जब बुरा बन उन्हें अपशब्द कहे तो मैं उन्हें सच्चा यार नजर आया,
सुना था अच्छाई से बुराई हमेशा जीतती है,
इस दुनिया में अच्छाई को बुराई से चारों खाने चित्त पाया,
हाँ कहते हैं अच्छाई से चैन की नींद आती है,
पर बुराई के बिना पेट भी मुश्किल से ही भर पाया,
आज देख देशों दुनिया का हाल,
मुझे अपना हाल नजर आया,
जो अच्छा है वो मरता है,
बुरे ने तो बैठ कर मजे से खाया,
अच्छे हो तो खाने की उम्मीद को छोड़ कोई दूजी उम्मीद नहीं रखना,
देश को क्या बचाओगे, खुद के बचने की भी उम्मीद नहीं रखना,
गीता का पाठ, जो खुद कृष्ण ने समझाया था,
उसको नए सिधांत के तहत पढना,
जीतना जरूरी है, अच्छे- बुरे के फेर में मत पड़ना…
अजीबो गरीब दुनिया से पाला पड़ा मेरा,
ना मैं अच्छा बन सुखी रह पाया,
और न बुरा चैन से सो पाया….
यश पल सिंह ०७-०९-१२